उत्तराखंड में आइसीएसई बोर्ड संबद्ध विद्यालयों को छोड़कर राजकीय, सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त अशाकीय व अंग्रेजी माध्यम संचालित विद्यालयों में पहली से 12 वीं कक्षा तक एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य करने का मामला हाई कोर्ट पहुंच गया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत नहीं देते हुए सीबीएसई व एनसीईआरटी को पक्षकार बनाने को कहा है। साथ ही सरकार को तीन अप्रैल तक मामले में जवाब दाखिल करने के आदेश पारित किए हैं।
नॉलेज वर्ल्ड माजरा देहरादून ने याचिका दायर कर कहा है कि पिछले साल 23 अगस्त को राज्य सरकार द्वारा शासनादेश जारी कर राज्य में आइसीएसई से संबद्ध विद्यालयों को छोड़कर अन्य सरकारी, पब्लिक स्कूल, अशासकीय विद्यालयों में एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य कर दी और निजी प्रकाशकों की किताबों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। सरकार की ओर से शासनादेश की मुख्य वजह यह बताई गई है कि निजी विद्यालयों में निजी प्रकाशकों की किताबें महंगे दाम में बेची जाती हैं और अभिभावकों पर अतिरक्त वित्तीय भार पड़ता है।
शिक्षा का व्यावसायीकरण रोकना चाहती है सरकार
सरकार शिक्षा का व्यावसायीकरण रोकना चाहती है और यदि किसी स्कूल या दुकान में निजी प्रकाशक की किताब बेची या लागू की जाती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने यह भी साफ किया था कि यदि किसी विषय के लिए निजी प्रकाशक की नितांत आवश्यक है तो उसका मूल्य एनसीईआरटी के मानकों के अनुसार निर्धारित किया जाए।
शासनादेश के इन्हीं बिंदुओं को याचिका के माध्यम से चुनौती दी गई है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की एकलपीठ ने बुधवार को मामले को सुनने के बाद याचिकाकर्ता से सीबीएसई व एनसीईआरटी को पक्षकार बनाने तथा सरकार को तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।






















