Jagannath Rath Yatra : ओडिशा के पुरी में आज (16 जुलाई, गुरुवार) से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत हो रही है। दुनियाभर में लोकप्रिय इस यात्रा को देखने के लिए देश-विदेश से सैलानी पहुंच रहे हैं। हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा को बहुत ही विशेष और पवित्र माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष द्वितीया तिथि को पुरी में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा संग अपने-अपने रथों पर सवार होकर नगर का भ्रमण करते हुए गुंडीचा मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। इस रथ यात्रा को देखने और रथ को अपने हाथों से खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए हर साल लाखों लोग पुरी पहुंचते हैं।
इस रथ यात्रा का आयोजन भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती होता है। दरअसल, लाखों भक्तों का प्रबंधन और इनके रुकने-रहने की व्यवस्था करना बेहद कठिन बन जाता है। हालांकि, इसके बावजूद हर वर्ष भक्त पूरे उल्लास के साथ यात्रा में जुटते हैं। आइये जानते हैं कि जगन्नाथ रथ यात्रा की मान्यता और कहानी क्या है, यह कब-कहां और कैसे शुरू हुई? क्यों ओडिशा का पुरी इस जगन्नाथ रथ यात्रा का केंद्र बनता चला गया?
क्या है जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी मान्यताएं?
1. मौसी के घर या जन्मस्थान की यात्रा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ-दिवसीय वार्षिक यात्रा पर अपनी मौसी के घर- गुंडिचा मंदिर जाते हैं।
कुछ धार्मिक ग्रंथों में गुंडिचा मंदिर को देवताओं का जन्मस्थान भी माना गया है। एक अन्य कथा यह भी कहती है कि तीनों भाई-बहन राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा से मिलने जाते हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने ही मंदिर की स्थापना की थी। भगवान वहां सात दिनों तक रुक कर अपनी मौसी के हाथों बने स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
2. सभी भक्तों से बिना भेदभाव के मिलन
जगन्नाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है, इसलिए रथ यात्रा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इस दौरान ब्रह्मांड के नाथ स्वयं गर्भगृह से बाहर आकर अपने सभी भक्तों को दर्शन देते हैं। यह यात्रा दर्शाती है कि भगवान जाति, समुदाय या सामाजिक पृष्ठभूमि के किसी भी भेदभाव के बिना सभी के लिए सुलभ हैं।
3. पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति
यह माना जाता है कि सजे हुए रथों पर देवताओं के दर्शन मात्र से ही लोगों के सारे पाप धुल जाते हैं और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुरी मंदिर से जुड़े धार्मिक ग्रंथ ‘वामदेव संहिता’ के अनुसार, जो भी तीर्थयात्री गुंडिचा मंदिर में एक सप्ताह तक देवताओं के दर्शन करता है, उसे अपने पूर्वजों के साथ अनंत काल के लिए बैकुंठ (स्वर्ग) में स्थान प्राप्त होता है।
4. रथ और रस्सियों को खींचने का महत्व
रथ को संधिनी शक्ति का प्रतीक माना जाता है और ऐसी मान्यता है कि रथ को केवल छू लेने से ही भक्तों को भगवान जगन्नाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है। रथ की रस्सियों को खींचना एक बेहद पवित्र और महान भक्ति का कार्य माना जाता है, जिससे भक्तों को दैवीय आशीर्वाद मिलता है और उनके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है।
5. भगवान का बीमार पड़ना (अणसर)
यात्रा शुरू होने से पहले, स्नान पूर्णिमा के अवसर पर देवताओं को 108 घड़ों के पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद देवता बीमार पड़ जाते हैं और लगभग 14-15 दिनों तक एकांतवास (अणसर) या ‘अणसर घर’ में विश्राम करते हैं और इस दौरान भक्तों को उनके दर्शन नहीं होते। जब वे पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते हैं (नव यौवन दर्शन), तब वे रथ यात्रा के लिए बाहर आते हैं।
6. देवी लक्ष्मी का रूठना और रसगुल्ले का भोग
एक रोचक मान्यता यह भी है कि रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी को साथ नहीं ले जाते। मान्यता के अनुसार, यात्रा के चौथे दिन देवी लक्ष्मी अपने पति को ढूंढते हुए गुंडिचा मंदिर आती हैं। जब भगवान नौ दिन बाद बहुदा यात्रा (वापसी की यात्रा) करके मंदिर लौटते हैं (नीलाद्रि बिजे), तो देवी लक्ष्मी उन पर क्रोधित होती हैं। उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान जगन्नाथ उन्हें रसगुल्ला भेंट करते हैं।
7. भगवान कृष्ण की वृंदावन यात्रा
कुछ परंपराओं और मान्यताओं में इस यात्रा को भगवान कृष्ण के अपने भक्तों से मिलने के लिए वृंदावन जाने के प्रसंग से भी जोड़ा जाता है। इस यात्रा में शामिल होने वाले भक्त भगवान के प्रति अपना समर्पण और सकारात्मकता दर्शाने के लिए पीले और लाल रंग के कपड़े पहनना शुभ मानते हैं, जहां पीला रंग ज्ञान और शांति का प्रतीक है, वहीं लाल रंग शक्ति और सौभाग्य को दर्शाता है।
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